
तुम्ही मेरी यादों मैं ऐसे बसे ,
मैंने अपने यादों के हर पल के खजाने को
तुम तक पहुँचाया तो था ,,,सोचा था ये
रहेगा तुम्हारे साथ ही हमेशा ,,,,,,
नदी मैं बहते पानी सा ,,,,,,
झरने मैं झरते हुए ,,पत्थरों से झुझते पानी सा
हर साल अमलतास के पीले फूलों सा ,,
खजाना तुम्हारे पास है न ,,,,,
बस वही मागूंगी तुमसे एक दिन ,,,
क्या लौटा पाओगे वो खजाना जो कभी
मैंने तुमको दिया था ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,उन्ही सुनहरे खतों मैं
हरे भरे पहारो के बीच ,,,,,,,,,,,वही जहाँ हाथ थाम
अजनबी पगडण्डी पे चल पड़े थे हम ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
या कुछ दोपहर के पलो का कुछ हिसाब ,,,,
क्या रख पाओगे ताउम्र ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कभी झाँक के तुम्हारे मन के कोने मैं
देखूंगी ज़रूर ,,,,,,,,,,,,,,,
यादे जो सिर्फ़ यादें होती हैं ,,,
वापस आवाज़ देने से भी नही आती ,,,,,,,,,,,