Wednesday, April 21, 2010

उदास मन


कभी मन ये सोच के उदास होता की मैं अकेली हूँ
फिर किसी के कहने पे की तलाश करती हूँ
कोई नया आयाम
जो मुझ तक सीमित न हो ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
स्वार्थ क्या रिश्तों मैं होता है ,,,,,,,,,,,,,
न जाने कोई कैसे दूर होता है
सोचती थी रिश्तों के कडवे सच मैं खुद को कही छूपा लूं
उस सच को कैसे कह दूं जब संगी का साथ नहीं होता
बातों का सिलसिला जब टूट जाता है ,,
कोई साथ रह कर भी साथ नहीं होता ,,,,
यही सोच कर मन उदास होता है ,,,,,,,,
श्रृंगार का कोई अर्थ नहीं होता ,,,,,,
करीने से बिछी चादर के नीचे खिंची रेखा को
किसने देखा है ,,,,,,,,जिसे इस दर्द का अहसास हो ,,,,,,,,,
हर दिन एक दिखावे का जरिया ही तो होता है ,,,,,,
,बस येही सोच कर मन कभी उदास होताहै ,,,,,,


किसी ने ये लाइन लिखी हैं जिसे मैं इसमें लिख रही हूँ
हर कोई कहीं न कहीं उदास है
अपने मैं सिमटा हुआ
किसी उम्मीद मैं की शायद किसी मोड़ पे वो मिल जाये
जिसके आने से ख़ुशी की लहर महसूस होती हो