Saturday, July 24, 2021

एक स्त्री की मौत

👧


 स्त्री औरत नारी ,यू तो अप्रितम कृति है ।

फिर भी क्यों वो जीवंत होते हुए भी मरती है ,

प्रतिदिन प्रतिपल प्रतिक्षण।

मैं भी एक नारी हूं ।

बेटा होती थी कभी अपने घर की।

निर्णय लेती थी  

मां पिता भाई की जान होती थी ।

समाज में सबकी दुलारी होती थी ।

फिर हुआ कुछ ऐसा  जब एक घर से दूसरे घर आ गई।

जहा प्यार भी दिया अपने संग ले संस्कार भी दिए ।

पाया क्या ,जिस दिन छोटी छोटी बातों पे उंगली उठी।

फिर वोही घर के झूठ से सामना हुआ ।

जब पहली बार खुद को मरते देखा ।

फिर कुछ लोगों ने परिवार तोड़ दिया।

परिवार को अहमियत देने वाली औरत 

फिर मरी एक बार ।

ईश्वर भी परीक्षा लेता रहा ।

रोज मार कर जीवित रखता रहा ।

रोज आत्मसम्मान पाने की आशा में करती रही 

लड़ती रही  झगड़ती रही खुद से कभी औरों से।

लगा की अनुबंधित हो गई चारदीवारी में।

मां के दिए संस्कार परिवार के लिए सब कुछ करो।

करती रही बार बार अपमान सहने के बाद भी।

माग का सिंदूर पोंछ दिया।

माथे बिंदिया मिटा दी ।

सुहागन होते भी छोड़ सब आगे बड़ने लगी थी।

 इतनी ताकत  थी की खुद का बलात्कार न होने दिया कभी।

मतलबी साथी भी शत्रु सा दर्द देता रहा बार बार ।

लोग अपनी गलती थोपते गए ।

क्यों चुप रह गई हर बार ।

अब जीती रही बच्चे के लिए ।

रोज मौत की गोद में समा जाने का सपना देखती रही ।

खुश होती प्रार्थना करती इस मौत के जीवन से 

एक शांत  अंत मिल जाए ।

दुर्भाग्य था ।

फिर इल्जाम लगा बेटी के रुपए लेके भाग जायेगी।

जब मर चुकी  थी पूरी तरह  ।

कैसे लगा ये इल्जाम नही पता ।

यही तो चाहा की नही रहना उसके साथ 

जिसको परवाह नहीं ।

कभी किसी का लिया नही ।

न सोना न जेवर न कपड़ा ।

फिर क्यों इतना बड़ा इल्जाम लगा दिया ।

क्यों इस औरत को मार दिया ।

मेरे दर्दों पे कुछ रिश्ते हंसते रहे ।

वो जिनके लिए सब कुछ किया ।

क्यों नहीं सोचा की इस औरत ने अपनी मां 

का मृत्यु के बाद दान दिए 

वो अपनी बेटी के रुपए लेकर क्यों भागेगी ।

जीते जी मुझको मार दिया 

अब उन सबको 

इंतजार है ,की एक मरे हुए इंसान की मौत देखने का ।

तभी तो में देखती हूं की मेरे बीमार होने पर 

उनके आंखों में चमक आ जाती है ।

इस तरह कई औरते जीते जी मरती हैं 

या मारी जाती  हैं ।