Wednesday, July 11, 2012

<उसकी सिसकिया पूरे घर में जैसे छ गयी थी ,मैं एक कोने मैं निस्तब्ध खड़ी बस एक अजीब सा छाया हुआ अंधकार खुद अपने अन्दर महसूस कर रही थी I हर रोज इस शोर से दूर जाने की बहुत कोशिश करती रहती रहती हूँ ,पर लगता है जैसे वो आवाज मेरे पीछे भाग रही है ,कानो में लगता है सीसा पिघला के कोई डाल रहा है I कब तक खुद से भागती रहूंगी दिशा भी तो नहीं मिलती जीने की ,क्यों अन्याय को रोज सहन करती हूँ ,क्यों उसका सामना करने से डरती हूँ I बस एक उसी आवाज से डर जाती हूँ मृत्यु किसके करीब है पता नहीं लेकिन मैं तो लगता है हर बार मर मर के जीती रहती हूँ कम्जर्ख मौत भी नहीं आती,दावा न खाने पर भी बीमारी और दूर होती जा रही है ,मनं कमजोर पड़ता जा रहा है ,जीवन और मेरे बीच आँख मिचोली चल रही है ,मैं हर बार हार जाती हूँ ,यूं तो जीवन खुद में एक बहुत मजबूत शब्द है जीवन के लिए कुर्बनियेओ से लेके दुआए तक मांगी जाती हैं ,बस ये जीवन एक छोटी सी जान के सामने घुटने टेक देता है ,हालाँकि उन सिसकियों से मेरा कोई नाता नहीं है फिर भी क्यों बंधन उसी मैं बंधा दीखता है ,जानती हूँ उसने मेरे साथ छल किया है ,फिर भी मैं उसकी सिसकियों को क्यों नहीं भूल पा रही हूं

Thursday, June 28, 2012

ab jine se uljhan hoti hai ,,,,,,,,,,,,,,,,,,ek bojh ke tale kab tak jiti rahungi pata nahi ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,bitiya ki khatir sirf jiti hoon har din har roj

Friday, March 16, 2012

ये जीवन


एक रंगमंच ही तो है ये जीवन ,,
हर रोज रूप बदल सामने आता है ये जीवन
नवसृजन में अपना तन मन अर्पण करता है ये जीवन
कल्पनाओ को सतह पे लाता है ये जीवन ,,,,,
सुख में दुःख में सम रहने की कोशिश करता हे ये जीवन
अवशेषों को तलहटी में रोज डालता हे जीवन ,,,,,
कभी खज़ाना सा लगता है ,,कभी सूना सा ये जीवन ,,,,
हर रिश्ते को एक डोर में कभी बांधता है जीवन ,,,,
एक आशा और निराशा का बंधन तो है ये जीवन .....
कभी छल कभी द्वेष कभी प्रेम सा है जीवन,,,,,
कभी चतुर्थी का चाँद है तो कभी अमावस्या की रात है जीवन ,,,,,,
कभी खिलखिलाता कभी मुंह छुपाता है ये जीवन,,,,,,,,,,,,,
मुझे तो हर पल अबूझ पहेली सा जन परता है ये जीवन