Tuesday, May 28, 2013

chand ki ahat





                                                         सुनी तो होगी तुमने,

वो आहट जो इन 
पत्तियों के साये मैं ,
      दबे पाँव छुपे चाँद से आई  थी,,,,,,,
  क्या फिर  भी तुम तनहा थे? 
कानों  मैं कोई आवाज 
जो उस  अमराई  से निकली 
चांदनी ने सुनाई थी,,,,,,,,,

                                                          क्या फिर  भी तुम तनहा थे ? 
सूरज   की  हर तपिश को समेटा  था
इसी ने तो अपने आँचल  मैं 
देने सुकून तुम्हे कुछ पल के
पालकी मैं सवार सी आयी थी ,,,,,,
क्या फिर  भी तुम तनहा थे ?  

Saturday, March 30, 2013

ruh



 हे इश्वर शक्ति दे की मैं उसकी रूह से प्यार कर सकू ,,,,
आँखों मैं देखू  मगर मैं उसके दिल मैं रह सकू 
 उसके अस्तित्व से नहीं उसकी आत्मा से प्यार कर सकू 
  उस गहरे समुन्दर मैं तैर कर नदिया पार कर सकू 
 हे इश्वर शक्ति दे की मैं उसकी रूह से,प्यार कर सकू ,,,,,,
काले घने बादलों मैं भी  धूप  का ताप सह सकू 
झर झर  गिरते झरनों मैं ठहरे पानी की गहराइ  नाप सकू 
बंद आँखों मैं भी खुली आँखों सा देख सकू 
हे इश्वर शक्ति दे की मैं  उसकी रूह से प्यार  कर सकू,,,,,,, 
अपनी सीमाओं मैं भी असीमित रेखाए खीच सकू 
मन  के हर छंद बांध को तोड़ के मैं उस तक जा सकू 
हिमालय की ऊंचाइयों को भी अपनी छाया दे सकू 
हे इश्वर शक्ति दे की मैं उसकी रूह से प्यार कर सकू ,,,,,,,


Saturday, February 9, 2013




आज फिर जिंदगी रुला कर खड़े  रहना सिखा  गयी ,
बचपन की कहानी, नेपोलियन को दिखी थी वो चींटी ,
बार बार गिरती संभलती ,फिर मुझे याद आ  गयी ,
रीते अवशेषों पे या पानी की लहरों पे ,
होता ज़रूर हे मुश्किल पर समय ही सिखा देता है ,
प्रारंभ और अंत क्या है ,सोचती हूँ आज भी
इन दोनों के अंतर को समझ नहीं पा  रही ,
जीना चाहती थी इस फासले को  कुछ इस तरह
की रश्क हो जाये जिंदगी  को खुद मुझसे ही ,
पर जो हो न सका ,वोही सवाल कुछ जवाब बन कर रह गया ,