
आज कल्पना हो मेरी
सारा आकाश हो मेरा
अभी तन्हाई मैं सब कुछ हो मेरे
तो कभी खामोश शब्द मेरे
क्या कल भी यूं ही होगा]
कभी साँझ के सूरज हो तुम
कभी विश्वास हो मेरा ,
कभी कही उपदेश देते नज़र आते हो
दर्पण के उस ओर घर पे मेरे
क्या कल भी यूं ही होगा
कभी चमकते चंदा हो तुम
आँगन मैं थाल रख कल्पना मैं तुम्हे बुलाती हूँ
घंटों तुम्हे निहारा करती हूँ
उस आँगन मैं मेरे
क्या कल भी यूं ही होगा
धुंध के पीछे से
मेरे गाँव मैं मेरा ही हाथ थामे आते हो मन मैं मेरे
क्या कल भी यूंही होगा
मेरे चित्रों मैं रंगों मैं कभी ब्रुश के किनारों पर
तुम परछाई से नज़र आते हो
बिखेर देती हूँ उन रंगों को पूजाघर के कोने मैं मेरे
क्या कल भी यूंही
होगा समुद्र की सच की तरह तुम आज कहते नज़र आते
जब खड़ी मैं विचारमग्न उन लहरों से खेलने कह कर यूं ही
चले जाते हो रिश्तों के उस दरवाज़े पर मेरे
क्या कल भी यूंही होगा
काश
अपने सुंदर शब्द कोष मैं उकेर देती उन मेहँदी भरे हाथों मैं
बालू के टीले पर अनछुई कल्पना बन आज तो आते हो
क्या कल भी यूंही होगा
अभी तन्हाई मैं सब कुछ हो मेरे
तो कभी खामोश शब्द मेरे
क्या कल भी यूं ही होगा]
कभी साँझ के सूरज हो तुम
कभी विश्वास हो मेरा ,
कभी कही उपदेश देते नज़र आते हो
दर्पण के उस ओर घर पे मेरे
क्या कल भी यूं ही होगा
कभी चमकते चंदा हो तुम
आँगन मैं थाल रख कल्पना मैं तुम्हे बुलाती हूँ
घंटों तुम्हे निहारा करती हूँ
उस आँगन मैं मेरे
क्या कल भी यूं ही होगा
धुंध के पीछे से
मेरे गाँव मैं मेरा ही हाथ थामे आते हो मन मैं मेरे
क्या कल भी यूंही होगा
मेरे चित्रों मैं रंगों मैं कभी ब्रुश के किनारों पर
तुम परछाई से नज़र आते हो
बिखेर देती हूँ उन रंगों को पूजाघर के कोने मैं मेरे
क्या कल भी यूंही
होगा समुद्र की सच की तरह तुम आज कहते नज़र आते
जब खड़ी मैं विचारमग्न उन लहरों से खेलने कह कर यूं ही
चले जाते हो रिश्तों के उस दरवाज़े पर मेरे
क्या कल भी यूंही होगा
काश
अपने सुंदर शब्द कोष मैं उकेर देती उन मेहँदी भरे हाथों मैं
बालू के टीले पर अनछुई कल्पना बन आज तो आते हो
क्या कल भी यूंही होगा
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