दादी
माइक्रोवेव मैं कुछ बनाने ही जा रही थी की पुरानी यादे ताज़ा हो गई ,,,,कमरे लेटी दादी की आवाज़ से घर दहल जाता था ,,,,अरे ,,,खीर बना रही है चीनी ज्यादा डालना चम्मच की आवाज़ न जाने कैसे उनके कानो मैं पहुँचती थी पता नही ,,,,मैं क्या बना रही हूँ क्या कर रही हूँ सिलसिलेवार उसका आँखों देखा हाल जैसे उनसे ही सुनती थी ,,,,,,,अगर थक गई है टू मैं आऊँ रहने दो दादी आराम करो मैं बना लूंगी ,,,,,,,,,हाँ तो कह रही थी खीर मंझले को मीठी ही भाती है,,,ठीक है दादी ,,,दाल मैं नमक भी बता दो लगे हाथ फीर बोलेंगी बडकू को कम नमक पसंद है ,,कीतना खीज्ती थी ,,,कभी लड़ती भी थी ,,,,,प्यार से बिठा कर दादी समझाती अरी समझाती हूँ कल ससुराल चली जायेगी वहाँ फीर च्कर्र्घीन्नी की तरह नाचना परेगा ,,,,,,सोचते सोचते आँखों से आंसू आ गए दादी तो चली गई अपने गंतव्य पे मुझे यहाँ इस मशीनी ज़िंदगी से लड़ने ,,सुबह से उठती हूँ घर मैं कोई बांटें करने सुन ने वाला कोई नही ,,,,घर मैं चारो तरफ़ लोंगो की आवाजों के बजाय मशीनों की आवाजों को सुनती हूँ ,,,,बच्चे आजकल कहाँ सुनते हैं कल ही तो छोटी को समझाया तो कह रही थी माँ मैं बड़ी हो गई हूँ ,,,,,,,,,,, एक समय था माँ चूल्हे की रोटी बना कर थक जाती मेहमानों का ततान लगा रहता था स्टोव आया तो खुश हुई अब म को आराम मीलेगा लेकिन मेह्माम तो जैसे सचमुच भगवान् का अवतार ,,,,,,,,,,,,,,,,,आज सोचती हूँ की आज सब कुछ है यूँ चटकी दबी बीना मेहनत के खाना तैयार पर कहाँ हैं वो बैठके वो मेहमान ,,,मैं भी अकेली इन्ही से रोज़ झुझ्ती हूँ और दादी की याद मुझे अभी भी सुकून देती है
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