Tuesday, August 5, 2008

विश्वास की डगर


हर पगडण्डी पे ठहर कर
मैं
ने जब पीछे मुढ़ कर देखा
तो
धुंधले पर चुके हर रस्ते पे
सिर्फ़ एक डगर ही तो दिखती थी ,,,,,,

आज
तक तुम बिन,,,
तुम्हारे साथ ही जीवन की राह
ख़ुद ही तो तय की
एक
आस की डोर के साथ
जो तुम तक अद्रश्य भाव से जाती थी ,,
कुछ यादें और बातों के बीच ,,,
वो पल याद है जब अपनी कमियों कों
तुम संग दो चार पल बैठ बांटती थी ,,,
उसी
नरम जुबान से तुम किस तरह
एक आवरण मैं उन्हें लपेट
यूँ हो तलहटी मैं डाल देते थे ,,,,,,,,,,,,,,,

और
नासमझ सी मैं ख़ुद पे तुम्हारा विश्वास
पाने की चेष्टा मैं मगन हो एक डगर ख़ुद ही बनाती रही ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
,
और इसी विश्वास की डगर के सहारे मैं आज दुनिया के सामने ,,,
ख़ुद
को काबिल सा पाती हूँ ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
आज
भी येही आस और विश्वास की डगर
मुझे
साफ़ स्वछन्द सी दिखाई देती है
जो
आगे मुझे मालूम है ,,,,,,,,,,,,
मेरे सतरंगी इन्द्रधनुषी सपनो मैं मुझे ले जायेगी ,,,,,,,,,,,,,,,
और समय के साथ कभी मिटने वाली
सिर्फ़ ये मेरे विश्वास की डगर तुम तक जाती है

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