आज फिर जिंदगी रुला कर खड़े रहना सिखा गयी ,
बचपन की कहानी, नेपोलियन को दिखी थी वो चींटी ,
बार बार गिरती संभलती ,फिर मुझे याद आ गयी ,
रीते अवशेषों पे या पानी की लहरों पे ,
होता ज़रूर हे मुश्किल पर समय ही सिखा देता है ,
प्रारंभ और अंत क्या है ,सोचती हूँ आज भी
इन दोनों के अंतर को समझ नहीं पा रही ,
जीना चाहती थी इस फासले को कुछ इस तरह
की रश्क हो जाये जिंदगी को खुद मुझसे ही ,
पर जो हो न सका ,वोही सवाल कुछ जवाब बन कर रह गया ,
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