Saturday, March 30, 2013

ruh



 हे इश्वर शक्ति दे की मैं उसकी रूह से प्यार कर सकू ,,,,
आँखों मैं देखू  मगर मैं उसके दिल मैं रह सकू 
 उसके अस्तित्व से नहीं उसकी आत्मा से प्यार कर सकू 
  उस गहरे समुन्दर मैं तैर कर नदिया पार कर सकू 
 हे इश्वर शक्ति दे की मैं उसकी रूह से,प्यार कर सकू ,,,,,,
काले घने बादलों मैं भी  धूप  का ताप सह सकू 
झर झर  गिरते झरनों मैं ठहरे पानी की गहराइ  नाप सकू 
बंद आँखों मैं भी खुली आँखों सा देख सकू 
हे इश्वर शक्ति दे की मैं  उसकी रूह से प्यार  कर सकू,,,,,,, 
अपनी सीमाओं मैं भी असीमित रेखाए खीच सकू 
मन  के हर छंद बांध को तोड़ के मैं उस तक जा सकू 
हिमालय की ऊंचाइयों को भी अपनी छाया दे सकू 
हे इश्वर शक्ति दे की मैं उसकी रूह से प्यार कर सकू ,,,,,,,


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