सुनी तो होगी तुमने,
वो आहट जो इन
पत्तियों के साये मैं ,
दबे पाँव छुपे चाँद से आई थी,,,,,,,
क्या फिर भी तुम तनहा थे?
कानों मैं कोई आवाज
जो उस अमराई से निकली
चांदनी ने सुनाई थी,,,,,,,,,
क्या फिर भी तुम तनहा थे ?
इसी ने तो अपने आँचल मैं
देने सुकून तुम्हे कुछ पल के
पालकी मैं सवार सी आयी थी ,,,,,,
क्या फिर भी तुम तनहा थे ?

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